निगम आयुक्त का यह संदेश जमकर हो रहा है वायरल,नहीं तो हो जाएगा निलंबन…………

कल प्रस्तावित नगर निगम की साधारण सभा से पहले आया रोचक मोड़
तहलका न्यूज,बीकानेर। नगर निगम में आयुक्त व महापौर के बीच विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। इस बीच अब आयुक्त के एक मैसेज ने पार्षदों को भी कटघरे में खड़ा करते हुए चेतावनी भरे लहजें में साधारण सभा में आने की बात कहकर राजनीतिक गलियारों में नया ही विवाद खड़ा कर दिया है। इस मैसेज में पार्षदों को बैठक में शामिल नहीं होने की स्थिति में निलंबन की बात कही गई है। जो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है। आयुक्त के इस कदम से एक बार फिर कांग्रेस सरकार की पारदर्शी शासन देने के कथन पर सवालिया निशान ही खड़े कर दिये है और सरकार की अब जमकर किरकिरी होने लगी है।नगर निगम की कल 27 मई को प्रस्तावित साधारण सभा की बैठक लगातार विवादों और सवालों के घेरे में है। जानकारों की माने तो राजस्थान नगरपालिका अधिनियम 2009 में साधारण सभा बुलाने का अधिकार महापौर/अध्यक्ष को है लेकिन इसके विपरीत आयुक्त गोपालराम बिरदा ने खुद ही एजेंडा जारी कर बिना महापौर निर्देशों या महापौर से चर्चा या सहमति के साधारण सभा की बैठक बुला ली।विवादास्पद इस बैठक का महापौर और भाजपा पार्षद ही नहीं बल्कि विपक्ष के पार्षदों द्वारा भी बहिष्कार करने जैसी खबरें आ रही हैं। महापौर या जनप्रतिनिधियों के अधिकारों का एक अधिकारी द्वारा हनन करने के इस मुद्दे पर हो सकता है पक्ष और विपक्ष के पार्षद एक हो जाएं।इस बीच आयुक्त गोपाल राम बिरदा का निगम अधिकारियों के ग्रुप में लिखा मैसेज काफी वायरल हो रहा है। धमकी भरे लहजे में लिखे इस मैसेज ने आग में घी डालने का काम किया है। आयुक्त द्वारा लिखे मैसेज में प्रस्तावित साधारण सभा की बैठक में अनुपस्थित रहने वाले पार्षद की सदस्यता से निर्हरता (निलंबन) की बात लिखी है। आयुक्त के इस रवैए से पक्ष और विपक्ष दोनों खेमे के पार्षद नाराज है।हालांकि आयुक्त के पास निलंबन के भी अधिकार नहीं हैं। एक विधि सलाहकार द्वारा नाम ना छापने की शर्त पर बताया कि संभवत: राजस्थान स्वायत्त शासन व्यवस्था के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है की किसी अधिकारी द्वारा बिना महापौर के निर्देशों और बिना महापौर की सहमति के साधारण सभा की बैठक बुला ली हो। अधिनियम की धारा 48 और 51 में साधारण सभा की बैठक बुलाने के समस्त अधिकार महापौर/अध्यक्ष में निहित हैं। कोई भी अधिकारी चाहे वह आयुक्त हो या निदेशक साधारण सभा की बैठक इस तरह नियमविरुद्ध नही बुला सकता। उदाहरण के रूप में समझें तो क्या मुख्य सचिव बिना विधानसभा अध्यक्ष या मुख्यमंत्री के निर्देशों या सहमति के विधानसभा सत्र बुला सकता है ..?
इसके अलावा बैठक शुरू करने के लिए भी कोरम पूरा करने के लिए एक तिहाई सदस्य होने आवश्यक हैं अगर तय समय पर एक तिहाई सदस्य (28) न हो तो बैठक आहूत ही नही की जा सकती है। एक तिहाई सदस्य उपस्थित न होने की स्थिति में सभा निरस्त मानी जावेगी इस हेतु तय समय में किसी तरह का अतिरिक्त समय देने का भी अधिकार सिर्फ महापौर/अध्यक्ष को है।
ये प्रश्न बने है चर्चा का विषय
खैर देखना रोमांचक होगा की कल साधारण सभा की इस बैठक में क्या होता है। लेकिन इस बीच 3 सवाल अहम है की क्या अफसरशाही जनप्रतिनिधियों पर इतनी हावी हो गई है की खुद को सर्वोपरि मानते हुए अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर जनप्रतिनिधियों के अधिकारों का हनन करे.?
क्या पार्षद पद की गरिमा और स्वाभिमान पर खड़े इस सवाल पर पक्ष और विपक्ष के पार्षद राजनीति से ऊपर उठ कर एक हो पाएंगे..?
क्या पार्षद स्वायत्त शासन व्यवस्था के संविधान कहे जाने वाले इस राजस्थान नगर पालिका अधिनियम 2009 की रक्षा कर पाएंगे…?

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