सेरूणा दुर्घटना वाली बस की कागजी कार्यवाही अनफिट,विभाग मौन

जयनारायण बिस्सा
तहलका न्यूज,बीकानेर। जिले की सड़कों पर सरपट दौड़ लगा रहे वाहन कब और किस समय लोगों की जिंदगी के लिए काल बनकर सामने आए जाए यह कहना बहुत मुश्किल है। क्योंकि दुर्घटना के बाद ऐसे कई मामले सामने आए हैं। जिससे यह साबित हो रहा है कि जिले की सड़कों पर कुछ गाडिय़ां बगैर फिटनेस प्रमाण पत्र के दौड़ लगा रही है तो कुछ गाड़ी को पुरानी और जर्जर हालत में भी विभाग की ओर से प्रमाण पत्र दे दिया जाता है। दरअसल, सड़क पर चल रहे वाहनों को फिटनेस देने का काम परिवहन विभाग है। विभाग के अफसर तो सड़क पर दौड़ लगा रही गाडिय़ों की नियमित रूप से जांच करते हैं और ही जर्जर पुराने वाहनों को फिटनेस का सर्टिफिकेट देने में सख्ती बरतता है। दरअसल,यह सब पैसों का कमाल है। इसलिए विभाग आंख मूंदकर तमाशबीन बना रहता है। सड़क दुर्घटनाएं बढ़ रही है और विभाग के अफसर मूकदर्शक बने हैं। ऐसा ही मामला शनिवार को सेरूणा के पास हुए हादसे में सामने आया है। जिस बस से मोटरसाइकिल सवार युवकों की टक्कर हुई थी। उस बस के फिटनेस प्रमाण पत्र की अवधि समाप्त हो गई थी। यहीं नहीं कर मान्य अवधि,पीयूसीसी नंबर की तारीख,वाहन आयु की अवधि तक खत्म हो चुके थे। उसके बाद भी पिछले आठ माह से यह बस बेरोक टोक सड़क पर दौड़ रही थी।
कागज पर फिट सड़क पर अनफिट
जिले की सड़कों पर चलने वाले कई खटारा वाहन का भी आपको फिटनेस प्रमाण पत्र मिल जाएगा। जबकि फिटनेस के 20 मानकों पर वाहन का खड़ा उतरना जरूरी है। भले की गाड़ी की बॉडी जर्जर हो,टायर डैमेज हो,स्टेयङ्क्षरग प्रणाली दोषपूर्ण हो, स्पेंशन दुरूस्त नहीं हो,हार्न खराब हो,लाइट में गड़बड़ी हो,इंडीकेटर का अता पता नहीं हो,ब्रेक प्रणाली भी गड़बड़ हो, वाहन का दरवाजा बंद नहीं होता लेकिन इसका फिटनेस प्रमाण पत्र टंच होगा। आज जिले में वर्षों पुराने वाहन धड़ल्ले से चल रहे हैं। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे वाहनों की भरमार अर्से पुराना टैक्ट्रर, ठेलामार कार व जीप, कंमाडर व अन्य वाहन मिल जाएंगे। जो फिटनेस के लिए जरूरी एक भी शर्त को पूरा नहीं कर रहा है लेकिन सड़क पर तेज गति से चलती है। जिले मे जुगाड़ गाड़ी का भी खूब प्रचलन है। यह सामान व सवारी गाड़ी दोनों को ढोने के काम में आता है। ऐसे में बैक लाइट तो दूर आगे का हेड लाइट भी दुरूस्त नहीं रहता है।
बिना जांच के मिल रहा फिटनेस प्रमाण पत्र
जिले में वाहनों के फिटनेस जांच के लिए कोई माकूल व्यवस्था नहीं है। इसके जिए जरूरी मशीन भी नहीं है। संचिकाओं व कागज पर ही सब कुछ चलता है। कागज पर तो वाहन फिट रहता लेकिन सड़क पर उसकी जर्जरता देखने लायक रहती है। फिटनेस प्रमाण पत्र पूरी तरह सुविधा शुल्क पर आधारित है। इसके लिए दलाल भी धड़ल्ले से मिल जाते हैं जो आपका कागजात लेकर सारा काम कराकर आपको दे देगा। नए निजी वाहन के पंजीकरण से 15 वर्षो तक फिटनेस प्रमाण पत्र की वैधता होती है। उसके बाद वाहन की फिटनेस की जांच कराकर प्रमाण पत्र हासिल करना होता है, जो कि पांच वर्षो के लिए मान्य होता है। वहीं, व्यावसायिक वाहन के लिए इसकी वैधता पंजीकरण के दो वर्षो तक होती है। इसके बाद प्रत्येक वर्ष वाहन की जांच कराकर प्रमाणपत्र हासिल करना होता है। बिना इसके वाहन का पंजीकरण वैध नहीं माना जाता है। निजी वाहनों का फिटनेस प्रमाणपत्र जिला परिवहन कार्यालय से प्राप्त किया जा सकता है। इसके लिए मोटर व्हीकल इंस्पेक्टर वाहन की जांच कर प्रमाण पत्र प्रदान करता है।
बिना दलाल के नहीं होते काम
जिला परिवहन कार्यालय पूरी तरह दलालों चंगुल में है। वाहन चालकों द्वारा फिटनेस प्रमाणपत्र हासिल नहीं करने के पीछे सरकारी व्यवस्था भी जिम्मेदार है। वाहन मालिकों का कहना है कि जिला परिवहन कार्यालय में बिना दलाल का काम करवाना दुश्वार है। लाइसेंस बनाने से लेकर वाहनों के फिटनेस प्रमाणपत्र पाने में इनका सहारा लेना मजबूरी है।
मानकों पर नहीं होती है जांच
केंद्रीय मोटर व्हीकल एक्ट-1989 के तहत वाहन के टायर, स्टेयङ्क्षरग, हॉर्न, ब्रेक, लाइट, इंडिकेटर, स्पीडोमीटर, पेंङ्क्षटग, वाइपर, बॉडी, प्रदूषण, सेफ्टी ग्लास व सेफ्टी बेल्ट सहित लगभग 20 मानकों की जांच कर उसे सड़क पर उतरने की इजाजत दी जाती है। वाहन चालकों के ड्राइङ्क्षवग लाइसेंस व दस्तावेज की जांच के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति की जाती है। खासकर राष्ट्रीय राजमार्ग पर तो न के बराबर जांच होती है। इसका मुख्य कारण परिवहन विभाग व यातायात पुलिस के पास कर्मचारियों की कमी है।

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